6 फ़रवरी 2016

हिन्दी शब्दों का उच्चारण

                                  हिन्दी शब्दों के उच्चारण 

   बहुत से हिन्दी प्रेमी भ्रष्ट उच्चारण अर्थात गलत उच्चारण पर नांक भौंह सिकोड़ते हैं , जो स्वाभाविक 
है और उचित भी । यदि शिक्षित व्यक्ति और विशेषत: हिन्दी भाषी और हिन्दी के ज्ञाता किसी शब्द का 
गलत उच्चारण करते हैं , तो आपत्ति होनी चाहिये । पर सामान्य लोग , चाहे वे किसी प्रान्त के हों , चाहे 
वे शिक्षित हों या साक्षर हों , यदि हिन्दी शब्दों का भ्रष्ट उच्चारण करते हैं , तो आँख मूँद कर उन की 
आलोचना करना ठीक नहीं होगा । यह देखना चाहिये कि वह कहाँ का है , देशी है या विदेशी और उस 
की शिक्षा का स्तर क्या है । 
   कुछ दिनों पहले बिहार में नवमनोनीत मन्त्री श्री तेज प्रताप ने शपथ ग्रहण के समय उच्चारण की ग़लती 
की तो फेसबुक पर अनेक लोगों ने उन की आलोचना की , जो सही थी । पर कुछ सज्जन उन के बचाव 
में विचित्र तर्क देने लगे । वे श्री नरेन्द्र मोदी को बीच में लाकर कहने लगे कि वे अनेक बार  कृपा शब्द को 
क्रुपा के रूप में बोलते सुने गये हैं । यदि उन के गलत उच्चारण पर ध्यान नहीं दिया जाता , तो बेचारे 
तेजप्रताप को क्यों आलोचना के कटघरे में खड़ा किया जा रहा है । इस पर मैं मे टिप्पणी करते हुए लिखा 
गुजरात और महाराष्ट्र के लोग प्राय: कृपा को क्रुपा बोलते हैं । तो श्री नरेन्द्र मोदी को क्यों निशाना बनाया 
जाए । 
  तो जितेन्द्र जिज्ञासु ने उत्तर में जो लिखा नीचे दे रहा हूँ --
" सर, हमारे बिहार में अक्सर लोग 'शर्मा जी' को 'सर्मा जी' और 'सिन्हा जी' को 'शिन्हा जी' बुलाते हैं, और उनकी ये आदत जीवन भर नहीं जाती है। मगर हर ज़गह इस उच्चारण-दोष की ख़ूब आलोचना होती है। इसलिए, गुजरात या महाराष्ट्र में अगर 'कृपा' को 'क्रूपा' बोला जाता है, तो ये उच्चारण-दोष है, जिसे जबरन सही नहीं ठहराया जा सकता। औऱ, ऐसा भी नहीं कि इसे ठीक नहीं किया जा सकता है।"
 मै ने उन की प्रतिक्रिया का यह उत्तर दिया -- 
" उच्चारण दोष को मैं ने ठीक नहीं ठहराया । केवल यह बताया कि यह प्रादेशिक दोष है , जिस के लिए आप ने बिहार के लोगों के उच्चारण दोष के उदाहरण दिये । दोष तो दोष है पर जो दोष बहुत से लोगों के उच्चारण में है , उस के लिए क्या सिर्फ मोदी जी को लांछित किया जाए? हिन्दी प्रेमियों को चाहिये कि वे व्यापक दोषों को नज़रअन्दाज़ करें ( उन का इस कमी के लिए उपहास न करें ) , अन्यथा वे स्ययम् को हिन्दी से अलग कर लेंगे । विदेशी लोग भारत में गलत हिन्दी बोलते हैं तो हम उन के बोलने पर ख़ुश होते हैं यह सोच कर कि वे हिन्दी तो बोल रहे हैं । अहिन्दी भाषी प्रान्तो के लोग कैसी भी हिन्दी बोलते हैं तो हम उन का स्वागत करते हैं । सिर्फ इसलिए कि कम से कम हिन्दी तो बोल रहे हैं । अन्यथा देश में हिन्दी के विरोधियों की संख्या कम नहीं है । " 
  यह केवल एक प्रसंग है , पर केवल हिन्दी शब्दों के ही गलत उच्चारण नहीं होते बल्कि अँगरेजी , उर्दू आदि 
भाषाओं के शब्दों के भी भ्रष्ट उच्चारण प्रचलित हैं । उदाहरण के लिए अंगरेजी के pleasure शब्द को प्लेयियर 
बोलने वाले ( प्राय: पंजाबी ) ओर budget को बडजेट बोलने वाले ( प्राय: दक्षिण भारतीय ) मिल जाते हैं । 
उर्दू के फ़िज़ूल शब्द को फजूल ( न फ के नीचे नुक़्ता और न ज के नीचे नुक़्ता ) और बेफजूल बोलने वाले भी 
मिल जाते हैं । अँगरेजी शब्दों के उच्चारण बंगाली और तमिल भाषी विविध ढंग से करते मिल जाते हैं और 
पंजाबियों की अँगरेजी का उच्चारण और भी रोचक है । प्राय: पंजाबी school को सकूल बोलते हैं और उर्दू 
वाले इस्कूल बोलते हैं । उत्तर प्रदेश के अनेक लोग भी इस्कूल या इसकूल बोलते हैं । तो उच्चारण की यह 
समस्या केवल हिन्दी के साथ नहीं है , अन्य भाषाओं के साथ भी है । मूल कारण यह है कि प्रत्येक भाषा का 
लिखित रूप एक होता है और मौखिक रूप में कुछ भिन्नताएँ आजाती हैं । किसी भी भाषा का रूप बोलने के स्तर पर विविध होजाता है , क्योंकि बोलने वाले का शिक्षा स्तर , परिवेष और आवश्यकताका दबाव विविध होता है । 
   --- सुधेश  
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