2 नवंबर 2013

विदेशी = हिन्दी सिलसिला

 भारत में बहुत से लोग यह कहते हुए मिल जाएँगे कि मुझे हिन्दी नहीं आती , पर अनेक विदेशी
हिन्दी पढ़ने के लिए भारत के विभिन्न नगरों में स्थित संस्थाओं या विश्वविद्यालयों में प़ति वर्ष
आते हैं । ऐसी ही एक रूसी महिला शाशा गोरडीवा हैदराबाद में आई । वहाँ उसे हिन्दी को लेकर
जो अनुभव हुए उसी के शब्दों में नीचे प़स्तुत हैं ।
-- सुधेश

विदेशी = हिंदी सिलसिला    ( मुझे हिन्दी आती है  नामक ब्लाग से )

बहुत से लोग सोचते हैं कि हिंदी बोलने की जानकारी भारत में बेकार है;  क्यौंकि पहला कारण यह है कि, भारत की संपर्क भाषा अंग्रेजी समझी जाती है. तथा इस सोच के पीछे दुसरा कारण यह है कि पूरे देश में हिंदी भाषा प्रचलित नहीं है (उदाहरन के लिए, तमिलनाडु के लोग हिंदी जानते हुए भी अंग्रेजी  में जिद के कारण बोलते हैं)।

मैं ने स्कूल में प्रथम श्रेणी से हिंदी सीखने की शुरूअत की. फिर सैंट-पीटर्सबर्ग स्टेट विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ़ ऑरीएन्टल स्टडीस पर हिंदी, संस्कृत और बंगाली भाषाएँ सीखीं थी. इस प्रकार मेरी ज़िन्दगी का रास्ता हैदराबाद पहुँच गया, जहाँ से मैं हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रयोजनमूलक हिंदी के विभाग में भरती हो गयी. हैदराबाद क्यों?! आंध्र-प्रदेश में तेलुगु बोली जाती है! एम. ए. प्रयोजनमूलक हिंदी क्यों?! किस लिए? येही प्रश्न मुझसे भारतीय लोगों ने एक हज़ार बार पूच्छा होगा। बात इस प्रकार है कि, आंध्र-प्रदेश में  मानविकी को ज्ञ्यादा महत्त्व नहीं दिया जाता है. कंप्यूटर साइअन्स, ईकनामिक्स, ऐम. बी. ए. आदि प्रासंगिक और उचित विषय समझे जाते हैं, बल्कि प्रयोजनमूलक हिंदी – यह तो बकवास है!

- आप भारत में क्या कर रहीं हैं?
- मैं हिंदी सीख रही हूँ।
- यह तो ठीक है पर करती क्या हैं?
यही वार्तालाप है, जो तीन सौ से ज्यादा बार मुझसे इंडिया में हो चुका है।

संक्षिप्त में मेरी कहानी इस प्रकार है, मैं हैदराबाद के विश्वविद्यालय में किस्मत से भेजी गयी थी। उत्तर भारत के कॉलेजों को हमारे अप्लाई करने के बावजूद, मोस्को नगर में स्थित भारतीय दूतावास ने यह तय किया कि हमें आंध्र-प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में पढ़ना चाहिए। परन्तु अपनी हिंदी को सुधारना मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था, पुस्तकों से अभ्यास करते हुए - हिंदी सीखना एक चीज़ है, और हिंदी बोलने वाले लोगों से बात करते हुए  सीखना  दूसरी चीज़ है। परन्तु हिंदी लोग मुझ से हिंदी में बात करना नहीं चाहते थे। बार-बार मैं हिंदी में प्रश्न करती जिसका जवाब मुझे अंग्रेजी में प्राप्त ही प्राप्त होता था। पूरे दो साल मैं इस प्रवृति को विनाश करने की कोशिश करती रही, परंतू हिन्दीवालों के दिमाग में एक स्थिर सिलसिला है - विदेशी = अंग्रेजी (यानी, विदेशी अंग्रेजी बोलता)। इस प्रकार पढ़ तो हिंदी में रही थी, लेकिन बात अंग्रेजी में कर रही थी।

स्पष्टतः भारत के कई राज्यों में हिंदी का उपयोग, भारतियों का रुसी भाषा बोलने के बराबर था।  उदहारण के तौर पर केरल और तमिलनाड को ही ले लीजिए। वे हिंदी जैसी “बनावटी”, “ओच्छी”  और “अनर्ह” भाषा का प्रयोग करने से साफ इनकार कर देते थे। उनके ख्याल में द्रविड़ भाषाएँ पुराणी, महान और गंभीर साहित्य से पूर्ण हैं, और हिंदी से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। फिर भी, कभी-कभी मुझे एसा लगता था कि हिंदी का ज्ञान प्राप्त करना एक जादुई छड़ी के समान है, जो सब गुप्त और छिपे  दरवाजे खोल देती है। ग्रेगोरी रोबर्ट्स की “शांताराम” नामक पुस्तक में लिखी हुईं बातों के अनुसार प्रत्येक देश में स्थानीय लोग खुश होते हैं जब उनकी भाषा कोई विदेशी बोल पाता है। बल्कि भारतवासी अपने देश के रीति-रिवाज और संस्कृति की ओर एक विदेशी की छोटी सी अभिरुचि के लिए भी अपना सौहार्द, दयालुता और मैत्री देने को तैयार हो जाते हैं। भारतवासियों के ख्याल मे, हिंदी बोल-समझने की क्षमता एक साधारण जानकारी नहीं है, बल्की उनके राष्ट्र के प्रति आदर और सम्मान अर्पित करने की भावना है, और इसी में ही उसका मूल्य है। भारत में हिंदी हर एक काम में मेरी मदद करती थी, जैसे - दफ्तरशाही के विरुद्ध लड़ने में, कीमतों को कम करने में, विविध छोटे-छोटे गावों में घूमने में, जल्दी दोस्त बानाने में और लोगों को ठीक तरह से समझने में आदि।

मुझे हैदराबाद में रहना बहुत अच्छा लगा क्योंकि इस शहर में दो तरह की संस्कृतियाँ मिलती  हैं। हिन्दू  और मुस्लिम सभ्यताओं का समनवय उत्कृष्ट रूप से शहर का श्रंगार करता है। हैदराबाद में हम दरगाह जाकर क़व्वाली सुना करते थे, और एक बार ईद के अवसर पर वडाली बंधू के शानदार संगीत को सुनने का मौका मिला। मैं चारमिनार के ऊपर चढ़ा करती थी, और इस के आस-पास के भव्य बाज़ार से आभूषण ख़रीदा करती थी। इस के अतिरिक्त, अलग-अलग हिन्दू देवताओं को समर्पित हिन्दू मंदिरों को मैं दर्शन-पूजन के लिए जाया करती थी , नागार्जुन सागर के केंद्र में स्थापित गौतम बुद्ध की मूर्ति को देखने जाया करती थी, दीवाली और होली के त्यौहारों को मनाया करती थी और हर दिन हैदराबाद की शोभायमान विभिन्नता के अन्दर डूबती जा रही थी. उन सब सुविधाओं के बावजूद हमें बहुत सारी त्रुटियाँ भी मिल रही थीं; जैसे स्थानीय लोगों की काफी बड़ी भीड़ होते हुए विदेशी लोग चारमिनार के क्षेत्र में बहुत कम मिलते थे, जिस के कारण विदेशियों की ओर बड़ी असीम दिलचस्पी व्यक्त होती थी, और वहां घूमना हमारे लिए मुश्किल था।

इस प्रकार एक दिन मेरी सहेली के साथ हम ने एक साहसी कदम बढ़ाया मानो हम बुरका खरीदकर ले आए और उसी वक्त से हमारी हिंदी की जानकारी अर्थपूर्ण और बेहद सार्थक हो गयी, और इसकी वजह से हमारी नईपहचान बन गई। हमारी ज़िन्दगी एकदम बदल गयी, माल के दाम गिर गए, हमारी ओर लोगों का नज़र डालना ख़त्म हो गया, दुकानदारों की बातों की ध्वनियाँ उतसुकता से रहित हो गयीं, किसी ने भी हमें और नहीं घबराया। ऐसा लगता था की हम अलग दुनिया में घुस आयीं हैं। हाँ, हमारी आखों का रंग थोडा अजीब लगता था, लेकिन उनहोने मान लिया कि वह नीला रंग आँखों में लगायी हुई लेंसों  कि बजह से था। हमारी हिंदी का रुसी लहजा दो-तिन वाक्यों में ज़ाहिर नहीं हो पाता था। इस लिए हम पकड़ी जा नहीं पाईं। हिंदी बोले बिना हमारी योजना बर्बाद थी।

छोटे-छोटे नगरों और गावों की यात्रा करते हुए जहाँ बहुत सारे हिन्दू मंदिर स्थित हैं हिंदी की भूमिका महत्वपू्र्ण थी। पुजारी देवताओं और उन की मूर्तियों की कहानियां हिंदी में सुनाते थे। हिंदी बोलते हुए छोटी-छोटी जगाहों में दुकानदार हमें समझ सकते थे, लोगों से हम हिंदी में बात करते थे। हिंदी के कारण हर जगह में हम कुशल, भयरहित और निडर महसूस कर  सकते थे। भारत मेरी दूसरी मातृभूमि बन गई, जिसे मैं प्रेम करने लगी, और जहाँ मैं असली रूप मे खुश रही।

निश्चित रूप से, भाषा राष्ट्र का अयाना होती है, जिस में लोगों की मानसकिता की बहुत ज्यादा जटिलताएं और विशेषताएं प्रतिबम्बित होती हैं। भारत के प्रति मेरे असीम प्रेम का महत्वपूर्ण कारण मेरा हिंदी भाषा का ज्ञान है।

-- शाशा गोरडीवा
( रूसी महिला )
Russia&India Report  में ११ अगस्त २०११ को प़काशित ।
अनिल जनविजय के सौजन्य से ।