26 अक्तूबर 2013

राजा राम मोहन राय

आधुनिक भारतीय समाज के जन्मदाता राजा राममोहन राय

 आज हम जिस युग में जी रहे हैं उसकी कल्पना समाज के महापुरुषों के बिना अधूरी है. इतिहास के कई स्वर्णिम पन्नों पर हमें ऐसे महापुरुषों की कहानी पढ़ने को मिलेगी जिन्होंने अपनी क्षमता, दूरदर्शिता और सूझबूझ से देश को नई राह दी. ऐसे ही महापुरुषों में से एक थे राजा राम मोहनराय. राममोहन राय अपनी विलक्षण प्रतिभा से समाज में फैली कुरीतियों के परिष्कारक और ब्रह्म समाज के संस्थापक के रूप में निर्विवाद रूप से प्रतिष्ठित हैं. राजा राममोहन राय सिर्फ सती प्रथा का अंत कराने वाले महान समाज सुधारक ही नहीं, बल्कि एक महान दार्शनिक और विद्वान भी थे.।

 राजा राममोहन राय का संक्षिप्त जीवन परिचय

राजा राममोहन राय का जन्म बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में 22 मई, 1772 को ब्राह्मण रमाकांत राय के घर हुआ था ।बचपन से ही उन्हें भगवान पर भरोसा था लेकिन वह मूर्ति पूजा के विरोधी थे. कम उम्र में ही वह साधु बनना चाहते थे लेकिन माता का प्रेम इस रास्ते में बाधा बना. परंपराओं में विश्वास करने वाले रमाकांत चाहते थे कि उनके बेटे को ऊंची तालीम मिले. इसके लिए कम उम्र में ही राममोहन राय को पटना भेज दिया गया. वहां जाकर उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त की और समाज में बदलाव की लहर लाने का निश्चय किया. राजा राममोहन राय को मुग़ल सम्राट अकबर द्वितीय की ओर से ‘राजा’ की उपाधि दी गई थी ।

 आसान ना थी बदलाव की राह

जब उनकी भाभी को सती होने के लिए बाध्य किया गया तो वे उनकी कारुणिक अवस्था से विचलित और द्रवित हो उठे. समाज में इस प्रकार की कुरीतियों के उन्मूलन के लिए उन्होंने जो भी प्रयास किए  उन्हें प्रारंभ में समाज ने नहीं स्वीकारा और वे बहिष्कृत कर दिए गए. समाज के इस विरोध के कारण ही उनको माता-पिता ने घर से निकाल देने में ही अपनी भलाई समझी. इसके बाद राममोहन राय तिब्बत चले गए. वहां भी उन्होंने समाज को अंधविश्वास की चपेट में जकड़े हुए देखा. अपने क्रांतिकारी स्वभाव के कारण उन्होंने तिब्बत में भी एक परिष्कारक के रूप में स्वयं को प्रस्तुत किया. इसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें तिब्बत छोड़कर पुन: बंगाल लौटना पड़ा.।

 लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपने मंजिल को पाने के लिए प्रयास करते रहे. उन्होंने लार्ड विलियम बैंटिक से मिलकर सती प्रथा समाप्त करने का अपना संकल्प शासनादेश जारी कराकर पूर्ण कर दिया. महिलाओं की कारुणिक परिस्थितियों पर तब लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ और लोग राममोहन राय को एक समाज सुधारक के रूप में जानने लगे. उन्होंने अनुभव किया कि अगर समाज की महिलाओं को शिक्षित किया जाए तो समाज सुधार में निश्चित सफलता मिलेगी. उन्होंने सरकार से मिलकर महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा प्रवर्तन के विद्यालय स्थापित कराए. इसी तरह केशवचंद्र सेन, ईश्वरचंद्र विद्यासागर के साथ ऐंग्लो वैदिक स्कूलों एवं महाविद्यालयों की स्थापना कराई. इसके बाद एक समय ऐसा भी आया कि साधारण जनता उनको राजा राममोहन राय के रूप में संबोधित करने लगी ।

 ब्रह्म समाज (Brahmo Samaj)

सिर्फ सती प्रथा को रोकना ही नहीं राजा राममोहनराय ने देश में मूर्ति पूजा, प्रेस की आजादी जैसे विभिन्न सामाजिक पहलुओं की तरफ भी जागरुकता पैदा की. हिन्दू समाज की कुरीतियों के घोर विरोधी होने के कारण 1828 में उन्होंने ‘ब्रह्म समाज’ नामक एक नए प्रकार के समाज की स्थापना की.

 ब्रह्म समाज तथा आत्मीय सभा के संस्थापक तथा आजीवन रूढि़वादी रिवाजों को दूर करने के लिए प्रयासरत राममोहन राय का 27 सितंबर, 1833 को ब्रिस्टल इंग्लैंड में निधन हो गया. महिला जागृति एवं सशक्तीकरण के उनके प्रयास आज भी सराहे जाते हैं.।

--(  विजय कुमार मल्होत्रा के सौजन्य से )
वेब दुनिया ब्लाग से साभार ।