20 मई 2013

हिन्दी विमर्श , भाग २

       
(प्रभाष जोशी विचारों से वामपंथी न थे लेकिन उन्होंने जनसत्ता के जरिये बौद्धिक और नैतिक साहस को पत्रकारिता के बुनियादी मूल्य के रूप में स्थापित किया, असहमति के साथ संवाद का वातावरण निर्मित किया। यही वज़हें थीं कि जनसत्ता सती -समर्थन के अग्निकुंड में गिर कर भी जीवित रह गया।
इधर मौजूदा जनसत्ता -सम्पादक ने वामपंथी लेखकों और संगठनों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। अखबार के अलावा सामाजिक मीडिया में भी वे वामपक्ष के खिलाफ तर्क -प्रमाण -हीन विद्वेषपूर्ण टिप्पणियाँ लिख -लिखवा रहे हैं। सामाजिक मीडिया में बहस का अवकाश रहता है, इसलिये वहाँ माकूल जवाब मिल जाता है। लेकिन अखबार उनकी मज़बूत जागीर है। वहाँ वे नाम ले कर हमारे खिलाफ अखबार के आधे पेज का ‘अनंतर’  लिखते हैं और लगातार अपनी जयजयकार कराते लेख लिखवाते – छापते जाते हैं।
हमने प्रत्युत्तर उसी हफ्ते भेज दिया था। देर हो गयी है, कह कर अगले हफ्ते छापने का आश्वासन भी हमें मिला। फिर  शब्द- सीमा का हवाला दे कर कहा गया कि लेख वगैर ‘काटछाँट’ के नहीं छप सकता। जनसत्ता बहस का मंच बना रहे, यही सोच कर हमने शब्द सीमा की शर्त भी मंजूर कर ली। अपने लेख को प्रस्तावित शब्द -सीमा के दायरे में भी ले आए। हमारा आग्रह केवल यह था कि हमारे नाम से हमारे द्वारा सही किया गया प्रारुप ही छपेगा। लेकिन सम्पादक महोदय हमारी ‘उम्मीद’ से बढ़ कर ‘कायर’ निकले। वे खाप – हत्याओं की वकालत करने वाले और कम्युनिस्टों पर नरभक्षी होने के इलज़ाम लगाने वाले लेख छाप सकते हैं लेकिन अपनी तर्कपूर्ण आलोचना का सामना नहीं कर सकते। यह हमारे  उसी लेख का अन्तिम प्रारूप है। — आशुतोष कुमार )
बहस दो हर्फों के बीच नहींभाषा और संस्कृति के बारे में दो नजरियों के बीच है
 ’गाली -गलौज’ कोशसिद्ध है, प्रयोगसिद्ध भी। मैंने ‘गाली -गलौच” लिखा। बहुत से लोग लिखते -बोलते हैं। ओम जी के हिसाब से यह गलत है। शिक्षक ऐसी गलती करें, यह और भी गलत है। गलती कोई भी बताए,  आभार मानना चाहिए।  निरन्तर सीखते रहना शिक्षक की पेशागत जिम्मेदारी है।
जिम्मेदारी या जिम्मेवारी ? कोश या कोष ?
आशुतोष कुमार, लेखक जाने-माने साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
ओम जी को ‘जिम्मेवारी‘ पसन्द है। फेसबुक पर फरमाते हैं, कोश में तो ‘ज़िम्मेदारी’ ही है। फिर भी अपने एक सहयोगी का  यह ख़याल उन्हें गौरतलब लगता है कि ‘जिम्मेदारी’ का बोझ घटाना हो तो उसे जिम्मेवारी कहा जा सकता है। लेकिन इसी तर्ज़ पर हमारा यह कहना उन्हें बेमानी लगता है कि गलौच बोलने से ‘गाली- गलौज’ लफ्ज़ की कड़वाहट कम हो जाती है। कि गलौज से गलाज़त झाँकती है, जबकि गलौच से, हद से हद, गले या गालों की मश्क। भोजपुरी में गलचउर और हिंदी में गलचौरा इसी अर्थ में प्रचलित हैं। हो सकता है इनका आपस में कोई सम्बन्ध न हो। लेकिन वे एक दूसरे की याद तो दिलाते ही हैं। सवाल बोलचाल में दाखिल दो प्रचलित शब्दों में से एक को चुनने का है। चुनाव का मेरा तर्क अगर गलचउर है तो ओम जी का भी गैर -जिम्मेदाराना। (गैर -जिम्मेवाराना नहीं।)
हिंदी में, तमाम भाषाओं में, एक दो नहीं, ढेरों ऐसे शब्द होते हैं जिनके एक से अधिक उच्चारण / वर्तनियाँ प्रचलित हों।  श्यामसुन्दर दास के प्रसिद्द ‘हिंदी शब्दसागर’ में एक ही अर्थ में शब्दकोष और शब्दकोश दोनों मौजूद हैं। भाषा में इतनी लोच जरूरी है। यह भाषाओं के बीच परस्पर आवाजाही का नतीजा भी है,  पूर्वशर्त भी। आवाजाही ओम जी का चहेता शब्द है। क्या यह सही शब्द है ? हिंदी के सर्वमान्य वैयाकरण किशोरीदास वाजपेयी और उनकी रचना ‘हिंदी शब्दानुशासन‘ के अनुसार हरगिज नहीं। उनके लिये राष्ट्रभाषा हिंदी का शब्द है – आवाजाई। वे मानते हैं कि हिंदी का यह शब्द पूरबी बोलियों से प्रभावित है। लेकिन हिंदी की प्रकृति के अनुरूप है। (शब्दानुशासन  पृ. 522,सं.-1998)
आचार्य की रसीद के बावजूद आवाजाई समाप्तप्राय है,  आवाजाही चालू। हिंदी के सामाजिक अध्येता रविकांत के मुताबिक भाषाएँ बदचलनी से ही पनपती हैं। शुद्ध हिंदी के हिमायती सुन लें तो कैसा हड़कंप मचे ! हड़कंप ? या  ’भड़कंप’ ? वाजपेयी जी का शब्द ’भड़कंप‘ है । (वही , पृ. 02)। आज सभी हड़कंप लिखते हैं। ‘बदचलनी‘  चलन बदलने का निमित्त है। समय के साथ जो चले गा, वही बचे गा। चले गा ? या चलेगा ? ‘शब्दानुशासन’ में अधिकतर पहला रूप है। कहीं कहीं दूसरा भी है। क्या मैं किशोरीदास वाजपेयी पर गलत हिंदी लिखने का इल्जाम लगा रहा हूँ ? उनका अपमान कर रहा हूँ ?
मैं ने कहा था – अज्ञेय ने भी गाली -गलौच लिखा है। फेसबुक पर मौजूद हिंदीप्रेमी मित्रों ने मूर्धन्य लेखकों की रचनाओं से ‘गाली -गलौच‘ के ढेरों उदाहरण पेश कर दिये। आप ने पुस्तकालय की तलाशी ली और संतोष की गहरी प्रसन्न सांस लेते हुये घोषित किया – सब की सब प्रूफ की गलतियाँ हैं। लेखकों के जीवित रहते छपे संस्करणों में ‘गलौज’ लिखा है।
शोध के लिये किताबों की धूल झाड़ना जरूरी है। लेकिन अक्ल की धूल झाड़ लेना पहले जरूरी है। मान भी लें कि बाद की तमाम किताबों के ढेर सारे संस्करणों में गलौच का आना महज़ प्रूफ की गलती है। लेकिन सारे के सारे प्रूफ-रीडर एक ही गलती क्यों करते हैं? कोई असावधान प्रूफ-रीडर गलौझ या गलौछ क्यों नहीं लिखता ? क्योंकि कोशकारों के अनजाने – अनचाहे गलौच अपनी जगह बना चुका है।
बेशक भाषा के मामले में लोच की एक लय होती ही है। बदचलनी की भी नैतिकता होती है। अंग्रेज़ी में इसे ’पागलपन में छुपी पद्धति’ कहते हैं। भाषाएँ नयी ‘चाल’ में ढलती हैं। लेकिन चरित्र और चेहरा उस तरह नहीं बदलता। व्याकरण शब्दानुशासन है। अनुशासन शासन नहीं है। अनुसरण भी नहीं है। भाषा के चरित्र और चेहरे की शिनाख्त है। अंतर्निहित लय की पहचान है। उस के स्व-छंद की खोज है। इसी अर्थ में वह स्वच्छंद भी है, अनुशासित भी। चाल, चरित्र, चेहरा, छंद और लय -इन्ही तत्वों से  भाषा की ‘प्रकृति’ पहचानी जाती है। वैयाकरण का काम है, भाषा की प्रकृति की पहचान कर भाषा के नीर-क्षीर विवेक को निरंतर जगाये रखना।
हिंदी की प्रकृति को परिभाषित करनेवाली एक विशेषता यह है कि वह ’हिंदी भाषा-संघ‘ में शामिल है। ‘हिंदी भाषा-संघ’ आचार्य किशोरीदास वाजपेयी की सुविचारित अवधारणा है। एक भाषा के मातहत अनेक बोलियों का परिवार नहीं, ‘बराबरी’ पर आधारित संघ। ‘संघ’ की सभी भाषाओं में शब्दों, मुहावरों, भावों, विचारों और संस्कारों की निरंतर परस्पर आवाजाही रही है। लेकिन इस तरह, कि भाषा विशेष की प्राकृतिक विशेषताएं प्रभावित न हों। इन्ही भाषाओं ने कुरु जनपद की ‘खड़ी बोली‘ को छान-फटक,  घुला-मिला, सजा-संवार व्यापक जनभाषा का  रूप दिया। यों ही नहीं मुहम्मद हुसैन ‘आज़ाद‘ ने उर्दू अदब के बेहद मकबूल इतिहास ’आबे हयात‘ की शुरुआत इस वाक्य से की – ”यह बात तो सभी जानते हैं कि उर्दू भाषा का उद्गम ब्रजभाषा है।!” जानते तो लोग यह हैं कि उर्दू / हिंदी की आधार बोली ब्रजभाषा नहीं। दिल्ली -मेरठ की बोली है। फिर भी ‘आज़ाद’  ब्रजभाषा को हिंदी / उर्दू की गंगा की गंगोत्री के रूप में रेखांकित करते हैं। जबकि जनसत्ता – संपादक को डर है कि बोलियों के बेरोकटोक हस्तक्षेप से हिंदी की स्वच्छ नदी गंदे ’नाले‘ में बदल जायेगी। कहते हैं -’पंजाबी में कीचड़ को चीकड़, मतलब को मतबल, निबंध को प्रस्ताव कहते हैं। क्या हम इन्हें भी अपना लें ?’  न अपनाइए। चाह कर भी अपना न सकेंगे। चीकड़,  मतबल, अमदी, अमदुर, चहुंपना आदि भोजपुरी में अनंत काल से प्रचलित हैं। लेकिन हिंदी की प्रकृति के अनुरूप नहीं हैं। सो हिंदी के न हो सके। ध्वनि-व्यतिक्रम हिंदी की विशेषता नहीं है। लोकाभिमुखता, सरलता और मुख -सुख है। आए कहीं से भी लेकिन चले वे ही हैं, जो यहाँ के लोगों की उच्चारण- शैली में ढल गए। कुछ दिन पहले मेरे ही अदर्शनीय मुँह से पंजाबी का ’हरमनप्यारा‘ लफ्ज़ सुन कर पाव भर आपका खून बढ़ गया था। ’आकर्षण’ के लिये पंजाबी में शब्द है -खींच ! खींच में अधिक खींच है या आकर्षण में ? पंजाबी ने हिंदी-संघ की भाषाओं के साथ अधिक करीबी रिश्ता बनाए रखा, इसलिये आज उसके पास अधिक रसीले– सुरीले शब्द हैं। हम पहले संस्कृत और अरबी -फारसी और अब अंग्रेज़ी का मुँह ज़्यादा जोहते रहे, सो जोहड़ में पड़े हैं।
’गलौच ‘के बारे में एक कयास यह है कि यह पंजाबी से आया है। पंजाबी में लोग गलोच लिखते- बोलते हैं। हिंदी ने गलोच को अपने हिसाब से ढाल कर चुपचाप गलौच बना लिया। यानी हिंदी पड़ोसी भाषाओं की छूत से नाले में न बदल जायेगी। आप ‘शुद्धिवादी’  न हों, लेकिन ’नाला‘  खुद एक प्रकार के पवित्रतावादी नज़रिए की ओर इशारा करता है। नाला मतलब अपवित्रता, गन्दगी और धर्म-भ्रष्टता। भाषा की  पवित्रतावादी दृष्टि हिंदी के ऊपर सांस्कृतिक या भाषाई राष्ट्रवाद के आरोप लगाने वालों का हौसला बढ़ाती है। इसके दीगर खतरे भी हैं।
जनसत्ता ने मेरे एक लेख में आये ”कैननाइजेशन‘‘ शब्द को  बदल कर ‘प्रतिमानीकरण‘ कर दिया था। इस तरह एक परिचित परिभाषित शब्द की हिंदी तो कर दी गयी, लेकिन इस हिंदी को समझने के लिये पहले अंग्रेज़ी शब्द जानना जरूरी है, यह न सोचा गया। हिंदी का अंग्रेज़ीकरण जितना बुरा हैउतना ही संस्कृतीकरण या अरबी-फारसीकरण। ये सारे करण’  सत्ताओं और स्वार्थों के खेल हैं। लेकिन भाषा की प्रकृति को कृत्रिम रूप से बदलने की असली प्रयोगशाला शब्द नहीं, वाक्य है। औपनिवेशिक प्रभाव के चलते अंग्रेज़ी वाक्यविन्यास, मुहावरे, अंदाज़ और आवाज़ ने हिंदी को कुछ वैसा ही बना दिया है, जैसा मैकाले ने अंग्रेज़ी शिक्षा के बल पर हिंदुस्तानियों को बनाना चाहा था। ऊपर से भारतीय, लेकिन भीतर से अँगरेज़।

1 टिप्पणी:

  1. .पूर्णतया सहमत बिल्कुल सही कहा है आपने .आभार . बाबूजी शुभ स्वप्न किसी से कहियो मत ...[..एक लघु कथा ]

    साथ ही जानिए संपत्ति के अधिकार का इतिहास संपत्ति का अधिकार -3महिलाओं के लिए अनोखी शुरुआत आज ही जुड़ेंWOMAN ABOUT MAN

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