25 अप्रैल 2014

रोचक प्रसंग


रोचक प्रसंग

छत्तीसगढ़ का नामकरण ( फएस बुक के हवाले से )

छत्तीसगढ़ की प्राणदायिनी शिवनाथ नदी २९० किलोमीटर की लम्बी यात्रा कर महानदी में विलीन हो जाती है। प्राचीन काल में शिवनाथ नदी के एक ओर १८ गढ़ थे और दूसरी ओर भी १८, इस प्रकार इन दोनों को मिलाकर क्षेत्र का नाम पड़ा- छत्तीसगढ़। अविभाजित मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ कमाऊ पूत तो था लेकिन उसे खाने के लिए केवल दो मुट्ठी चाँवल मिलता था इसलिए वह पिछड़ेपन का दुख भोगते हुए तब तक सिसकता रहा जब तक कि सन 2000 में पृथक छत्तीसगढ़ नहीं बना। http://atmkatha.blogspot.in/p/blog-pag
-- द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

छत्तीस गढ़ में हो सकता है ' टेम्पा ' हो किन्तु मालवा उज्जैन में इसे 'टेपा' ही कहा जाता है । शायद (पक्का पता नहीं) इसे पं. शिव शर्मा जी ने प्रारम्भ किया था ।हर वर्ष 'टेपा-सम्मेलन' में देश के बड़े बड़े नेताओं, साहित्यकारों और अन्य बड़ी हस्तियों को आमंत्रित कर उन्हें - टेपा सम्राट' टेपाधिपती' और इसी प्रकार की अन्य उपाधियों से नवाज़ा जाता । यह कार्यक्रम पूरे देश में चर्चित होता था
--- ओम गिल

दुनिया को सदा ताज़ा रखना !

" अधिकांश भाव हमारे लिए पुराने होते हैं और हमारे मन का धर्म ही यह है कि पुरानी अभ्यस्त वस्तुओं के संपूर्ण सौंदर्य और रस के अनुभव करने की क्षमता हममें नहीं है, इसीलिए कोई कवि जब पुराने भावों के बीच भाषा, छंद और अभिव्यक्ति की नई भंगिमा के द्वारा हमारे मन को खींच ले जाता है, तब हम पुनः उन्हीं वस्तुओं के रस का आस्वादन नए रूप में करने लगते हैं । कवियों का मुख्य काम इस दुनिया को सदा ताज़ा रखना है ।"
- विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर
( जय प्रकाश मानस के सौजन्यसे )

Tejendra Sharma आप कहते हैं "उर्दू शायरी में जगह बनाने के लिये मुसलमान नाम या तख्ख़लुस ज़रूरी हो जाता था। .. " क्या 'फ़िराक़' नाम मुसलमानी है? क्या इसे आप यों नहीं देख सकते कि फ़िराक़ साहब उर्दू में लिखते थे, इसलिए उन्होंने उर्दू तख़ल्लुस (तख्ख़लुस नहीं) चुना। उनका पूरा नाम मैंने यह बताने को लिखा कि वे मुसलमान नहीं, हिन्दू थे और महान उर्दू शायर थे। यानी उर्दू केवल मुसलमानों की भाषा नहीं है। प्रसंगवश बता दूँ कि फ़िराक़ साहब के पिता भी नामी शायर थे और वे गोरख प्रसाद 'इबरत' के नाम से ही जाने जाते हैं। शाहजहां के दरबार के पं चंद्र'बिरहमिन' से लेकर आगे विश्‍वेश्‍वर प्रसाद 'मुनव्‍वर' लखनवी, नौबतराय 'नजर', पं. दयाशंकर 'नसीम', त्रिलोकचंद 'महरूम', बालमुकुंद 'बेसब्र', पं. बृजनारायण 'चकबस्‍त', हरगोपाल 'तफ्ता' आदि खूब जाने-माने शायर रहे हैं जो हिन्दू थे और उर्दू अदब में उनका नाम था। … जाने-अनजाने आप वही खेल कर रहे हैं, जो भाजपा कर रही है। उर्दू में लिखते हुए कोई उसी भाषा का तख़ल्लुस चुने, इसमें गलत क्या है! फिर आप साहित्य की चर्चा में यह प्रसंग ले आते हैं कि "एक ज़माना था कि हिन्दी फ़िल्मों में मुसलमान मर्द और औरतें अपने नाम बदल कर फ़िल्मों में काम किया करते थे" … जब आप मानते हैं कि वह "अलग विषय" है तो उसका जिक्र यहाँ ले आने का सबब?
-- ओम थानवी
फेसबुक से साभार ।
८ अप्रैल २०१४ को प्रकाशित ।


महावीर स्वामी पेड़ के नीचे ध्यानमग्न बैठे थे। पेड़ पर आम लटक रहे
थे।
बच्चों ने आम तोड़ने के लिए पत्थर फेंके। कुछ पत्थर आम को लगे
और एक महावीर स्वामी को लगा।
बच्चों ने कहा - प्रभु! हमेंक्षमा करें, हमारे कारण आपको कष्ट हुआ
है।
प्रभु बोले - नहीं, मुझे कोई कष्ट नहीं हुआ।
बच्चों ने पूछा - तो फिर आपकी आंखों में आंसू क्यों?
महावीर ने कहा - पेड़ को तुमने पत्थर मारा तो इसने तुम्हें मीठे फल
दिए, पर मुझे पत्थर मारा तो मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सका, इसलिए मैं
दुखी हूँ ।

साहित्य मन्त्र के सौजन्य से ।

भारत में आ गये?

निरालाजी एक बार किसी दूसरे नगर में अपने एक मित्र के यहाँ गए. उनके मित्र बड़े आदमी थे. वहां कई महीने रह गए. लौटने पर उनके कोई परिचित सज्जन सडक पर संयोग से मिल गए.उन्होंने नमस्कार के बाद कहा -"इधर कई महीनों से आप दिखाई नहीं दिए, क्या कहीं बाहर चले गए थे?" उन्होंने संक्षेप में "हाँ" कह दिया. तब उन सज्जन ने दूसरा प्रश्न किया, "कहाँ गए थे?" निराला जी ने गंभीर भाव से उत्तर दिया, "विलायत गया था."यह सुनकर उन सज्जन ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा -"विलायत? आपके विलायत जाने की बात तो किसीने बतलाई नहीं!" निराला जी ने व्याख्या करते हुए कहा -"वहां मैं गया था. वहां बढ़िया पक्की आलीशान कोठी थे. गद्देदार बड़े-बड़े पलंग थे, सोफे थे, गद्दीदार कुर्सियां थीं. फ्लश लेट्रिन थी. बिजली थी. बिजली का पंखा था. मोटर थी, फूलों का बाग़ थे. लाऊं थे. टेलेफोन था. लोग अधिकतर अंग्रेजी बोलते थे........और अब मैं यहाँ लौट आया हूँ. यहाँ खपरैल का मकान है. टूटी चारपाई है, ज़मीन पर बिछाने को चटाई है. रौशनी के लिए मिटटी के तेल की डिबरी है. खुड्डी वाला पाखाना है जो दुसरे-तीसरे दिन साफ़ किया जाता है. हाथ का ताड़ का पंखा है. यहाँ आने पर वह अनुभव होने लगा किअभी तक मैं विलायत में था और अब भारत में आ गया हूँ. इसीलिये मैंने आपसे कहा कि विलायत गया था.
साभार : मनोरंजक संस्मरण -श्रीनारायण चतुर्वेदी
(रमेश तेलंग के सौजन्य से )

आज प्रसिद्ध गद्यकार श्री शैलेश मटियानी की पुण्यतिथि है। उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था। उन्होंने उपन्यास, कहानियों के साथ ही अनेक निबंध और संस्मरण भी लिखे हैं। उन्होंने 'विकल्प' और 'जनपक्ष' नामक दो पत्रिकाएँ निकाली। हमारी ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
---भोला नाथ त्यागी के सौजन्य से ।