3 जून 2014

शब्दकोश विवाद

शब्दकोश विवाद

शब्दकोष विवाद को लेकर वर्धा हिंदी अंतर्राष्ट्रीय विश्वद्यालय के पूर्व कुलपति विभूति नारायण राय विवादों में है। वे पहले भी विवादों में रहे हैं। राय से हुई बातचीत के प्रमुख अंश -

जनसत्ता आपके ऊपर अक्सर मेहरबान रहा है। आपको लेकर कई विवादों पर उसमें लंबी लंबी चर्चाएँ हुईं हैं। आजकल भी वर्धा हिंदी शब्दकोश को लेकर एक विवाद पिछले कुछ हफ़्तों से चल रहा है। जनसत्ता के संपादक ने तो आपसे अपना पक्ष रखने की अपेक्षा भी की है। आप जनसत्ता में अपना पक्ष क्यों नहीं रखते?
(हंसते हुए) सही बात है कि जनसत्ता के साथ पिछले तीन चार वर्षों से मेरे रागात्मक संबंध रहे हैं। शब्दकोश वाला विवाद शायद तीसरा या चौथा विवाद है पर यह संबंध इकतरफा है। मैंने कभी ओम थानवी को गंभीरता से नहीं लिया। मेरे मित्र जानते हैं कि मुझे शुरू से ही विवादों में मजा आता है और मैं कभी लड़ाई में भागता नहीं…. जम कर लड़ता हूँ। पर मैंने आरम्भ से ही लड़ाई के कुछ उसूल बना रखें हैं। उनमें से एक यह है कि मैं शिखंडियों से कभी नहीं लड़ता……
(बीच में टोकते हुए ) आप यह कहना चाहते हैं कि ओम थानवी के पीछे कोई और है जो यह सब करवा रहा है……..कौन है वह?
 देखिये अभी मैं उस व्यक्ति का नाम नहीं लूंगा पर मैं इतना कहूंगा कि हिंदी जगत का एक कल्चरल इवेंट मैनेजर है जो पिछले कई दशकों से स्वयं को कवि मनवाना चाहता है पर हिंदी जगत है कि उसे कल्चरल जाकी से अधिक मानने के लिए तैयार नहीं है। मैं इस व्यक्ति का नाम तब लूंगा जब यह अपने शिखंडी के स्थान पर खुद मेरे सामने खड़ा होगा। इस भूतपूर्व नौकरशाह पर मूर्तियों की तस्करी से लेकर अपने बेटे के लिए सरकारी पद के दुरुपयोग तक के गंभीर आरोप हैं। एक बार वह खुल कर सामने आयेगा तब मैं इन आरोपों की फेहरिस्त भी जारी करूंगा। रही बात ओम थानवी की तो मैं पहले ही निवेदन कर चुका हूँ कि मैं उन्हें औसत पत्रकार से अधिक कुछ नहीं समझता और उनसे किसी विवाद में उलझना समय की बरबादी मानता हूँ। ज्ञानपीठ वाले विवाद के बाद भी कई लेखक मित्रों ने यह सलाह दी थी कि हमें विवेक गोयनका को एक सामूहिक पत्र लिखकर यह शिकायत करनी चाहिए कि यह शख्स व्यक्तिगत कुंठा और दुर्भावना के तहत उनके अखबार का दुरुपयोग कर रहा है पर मैंने ही यह कह कर ऐसा न करने की सलाह दी थी कि हमें इस व्यक्ति को लेकर अपना समय बरबाद नहीं करना चाहिए। मुझे पता है कि भविष्य में भी मुझे लेकर ओम थानवी विवाद खड़े करते रहेंगे पर मैं उन्हें इस लायक नहीं समझता कि उन पर अपना समय जाया करूं। अत: अगले विवादों में भी उनसे नहीं उलझूंगा। जनसत्ता में अपना पक्ष न रखने का एक कारण यह भी है कि बदनीयती से चलाये गये अभियानों में ओम थानवी नें फोन कर कर लोगों से मेरे खिलाफ लिखवाया और बहुत से ऐसे लोगों को नही छापा जिन्होंने मेरे पक्ष में लिखा था। इस लिए वहां लिखने का मेरे मन में कभी कोई उत्साह नही रहा।
 हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा जो शब्दकोश बनाया गया है उसके पीछे परिकल्पना क्या थी?

नागरी लिपि में लिखी जाने वाली खड़ी बोली को मानक हिंदी के रूप में स्वीकृति प्राप्त हुए अभी सौ से कुछ ही अधिक वर्ष हुयें हैं। नई भाषा के सामने प्रारंभिक दौर में जो चुनौतियां आतीं हैं उनमें से एक मानक शब्दकोश का निर्माण भी है। हिंदी इस मामले में सौभाग्यशाली है कि उसे शुरुआत में ही अद्भुत मेधा, क्षमता और लगन वाले सेवी मिले। प्रारंभिक चरण में बने नागरी प्रचारिणी सभा, ज्ञानमंडल और इलाहाबाद साहित्य सम्मलेन जैसी संस्थाओं के शब्दकोश इस सन्दर्भ में बड़े सांस्थानिक उदाहरण हैं। बाद में कामिल बुल्के, हरदेव बाहरी तथा अन्य कई विद्वानों के व्यक्तिगत प्रयासों से भी महत्वपूर्ण शब्दकोश बने। पर इन सारे प्रयासों में एक कमी खटकती है। ये सारे शब्दकोश एक संस्करण वाले हैं। बाद में इन सबकी बीसियों आवृत्तियाँ छपीं पर यदि आप ध्यान से देखें तो आपको उनमें बहुत कम कुछ नया जुड़ा दिखाई देगा। वस्तुत: जिन प्रतियों पर चौथा, छठा या बीसवां संस्करण लिखा दिखाई भी दे आप मान सकते हैं कि यह उस कोश की चौथी, छठी या बीसवीं आवृत्ति होगी। इसके बरक्स यदि आप अंगरेजी में आक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज डिक्शनरियों की परंपरा देखें तो आप पायेंगे कि इनका हर संस्करण एक नई खबर बनता है। हर बार यह बताया जाता है कि इस नए संस्करण में कितने सौ शब्द किन-किन भाषाओं से आकर जुड़ें हैं। इन शब्दकोशों का हर संस्करण इस अर्थ में संशोधित/परिवर्धित होता है कि उनमें बहुत से नए शब्द जुड़ते हैं, बहुत से अप्रचलित या कम प्रचलित शब्द कोश से बाहर चले जातें हैं और नए संस्करणों में शब्दों के अर्थों में समय के साथ आये बदलावों को पकड़ने का प्रयास भी किया जाता है। अभी पिछले हफ्ते ही एक खबर सुर्ख़ियों में थी कि आक्सफोर्ड डिक्शनरी के ताज़ा संस्करण में नौ सौ से अधिक नए शब्द जुड़ें हैं और इनमें से अधिकतर शब्द एस.एम.एस.या इंटरनेट जैसे माध्यमों से आयें हैं। दुर्भाग्य से हमारे यहाँ ऐसा नहीं हुआ। वर्धा शब्दकोश की परिकल्पना के पीछे यही सोच काम कर रही थी। मैंने योजना बनायी थी कि मेरे वर्धा छोड़ने के पहले एक स्थायी शब्दकोश प्रकोष्ठ काम करने लगेगा जो न सिर्फ हिंदी-हिंदी शब्दकोश, हिंदी-अंगरेजी शब्दकोश, अंगरेजी-हिंदी शब्दकोश का निर्माण करेगा बल्कि हर दो तीन वर्ष बाद इनके संशोधित/परिवर्धित संस्करण भी तैयार करता रहेगा। मेरा लक्ष्य था कि अक्टूबर 2013 (जब मैं विश्वविद्यालय से रिटायर होने वाला था) तक वर्धा हिंदी शब्दकोश तथा उसका लघु संस्करण वर्धा छात्रोपयोगी हिंदी शब्दकोश बाजार में आ जाये। मुझे प्रसन्नता है कि मेरे विश्वविद्यालय छोड़ने तक वर्धा हिंदी शब्दकोश प्रकाशित हो गया। अब यह मेरे सुयोग्य उत्तराधिकारी को देखना है कि वे इस परियोजना को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।
शब्दकोशों का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है तथा उसमें भाषा शास्त्रियों तथा शब्दकोशकारों की उपस्थिति बहुत जरूरी है। आशा है आपने इसका ध्यान रखा होगा।
सही है शब्दकोश निर्माण में कोशकारों का बहुत महत्व है। हमने देश भर में एक दर्जन से अधिक भाषा वैज्ञानिकों और शब्दकोशकारों को इस परियोजना से जोड़ा था और वे समय समय पर इलाहाबाद तथा वर्धा में आयोजित बैठकों में शरीक होकर इस परियोजना के संबंध में महत्वपूर्ण सुझाव देते रहे। यदि मुझे यह ज्ञान होता कि ओम थानवी और कमल किशोर गोयनका तथा अवनिजेश अवस्थी महत्वपूर्ण भाषा वैज्ञानिक हैं तो मैं उन्हें भी इस परियोजना से जोड़ने का प्रयास करता। इस परियोजना से जुड़े विद्वानों ने ही तय किया था कि हम मानक वर्तनी का प्रयोग करेंगे और इसी लिए यह हिंदी का अकेला मानक वर्तनी वाला कोश है। आप इसे देखें …( फादर कामिल बुल्के का कोश दिखाते हुए ) इसमें मुखपृष्ठ पर हिन्दी लिखा है जबकि अंदर के पृष्ठों में हिंदी है। वर्तनी को लेकर हिंदी समाज अराजक है और वही अराजकता शब्दकोशों में भी है। इस शब्दकोश में आप वर्तनी में एकरूपता पायेंगे।
वर्धा हिंदी शब्दकोश के प्रारंभ में आपकी एक टिप्पणी है जिसमें आपने शब्दकोशों की राजनीति की बात की है। अपना आशय तनिक और स्पष्ट करेंगे……।
हाँ, यह एक बहुत दिलचस्प तथ्य है जिस पर मेरा ध्यान इस परियोजना से जुड़ने के बाद गया। शब्दकोशों के निर्माण में लगभग वही राजनीति काम कर रही थी जो तत्कालीन हिंदी समाज की थी। मसलन हम सभी जानते हैं कि जिस समय खड़ी बोली आधिकारिक हिंदी बनाने का प्रयास कर रही थी उस समय भारतेंदु जैसा विराट व्यक्ति भी यह मानता था कि खड़ी बोली में कविता नहीं लिखी जा सकती। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि उनका गद्य खड़ी बोली में तथा अधिकांश पद्य ब्रज भाषा में है। 1893 में नागरी प्रचारिणी सभा ने शब्दकोश पर पहली बार गंभीरता से विचार करना शुरू किया। अपनी पहली वार्षिक रिपोर्ट(1894) में नागरी प्रचारिणी सभा ने यह माना कि हिंदी गद्य का अर्थ खड़ी बोली में लिखा जाने वाला गद्य है और ब्रज तथा दूसरी बोलियों में लिखे गए पद्य से उसका कविता संसार बनता है। यद्यपि नागरी प्रचारिणी सभा के संस्थापकों में से एक श्यामसुन्दर दास तथा खड़ी बोली के जुझारू समर्थक अयोध्या प्रसाद खत्री मजबूती से खड़ी बोली में कविता लिखने की वकालत कर रहे थे, यह एक तथ्य है कि 1920 तक पाठ्यपुस्तकों में ब्रज तथा अवधी में लिखी कविताएँ ही पढ़ाई जाती थीं। खड़ी बोली समर्थक श्रीधर पाठक तथा ब्रज भाषा समर्थक राधा चरण गोस्वामी के बीच लंबा विवाद चला था जिसका उल्लेख स्थानाभाव के कारण करना सम्भव नही है पर हिंदी समाज की इस सोच का असर नागरी प्रचारिणी सभा के शब्दकोश (1922-1929 खंड के ) पर पड़ा और पूरा शब्द कोश ब्रज के शब्दों से भरा हुआ है। इनमें से ज्यादातर शब्द अब हमारी बोलचाल या लिखित भाषा में प्रयोग में नही आते। हमें उन्हें निकालना पड़ा। इस निर्णय के पहले विचार विमर्श के दौरान एक तर्क यह दिया गया कि शब्दकोशों में कम प्रचलित शब्द भी रहने चाहिए क्योंकि पुराने साहित्य के पाठक उनके अर्थ तलाशते हुए शब्दकोश उलट पुलट सकते हैं पर एक खंड के शब्दकोश की अपनी शब्द सीमा होती है और जब भाषा में नये आये हजारों शब्द कोश में सम्मिलित होने को बेकरार हों तो अप्रचलित या कम प्रचलित शब्दों को उनके लिए स्थान खाली करना ही पड़ेगा।
हिंदी भाषिक समाज की दूसरी बड़ी राजनीति भाषा के समावेशी चरित्र को लेकर है। हम जानते हैं कि खड़ी बोली हिन्दुओं और मुसलमानों की साझी परम्परा है। यह दुनिया की अकेली भाषा है जो दो लिपियों में लिखी जाती है और लिपियों के साथ इसका नाम बदल जाता है – फारसी लिपि में लिखी भाषा उर्दू तथा नागरी लिपि में लिखी हिंदी कहलाती है। हिन्दुओं और मुसलमानों के हजार साल के साथ ने कुछ अद्भुत चीजें मनुष्यता को दी हैं उदाहरण के लिए हम इनके सहअस्तित्व से उपजे संगीत, स्थापत्य, मूर्तिकला, वास्तुकला और पाकशास्त्र को ले सकते हैं पर यह भी सही है कि इन दोनों के आपसी सम्बन्धों का इतिहास रक्तरंजित संघर्षों का भी रहा है। जब बोली के रूप में एक साझी भाषा खड़ी बोली विकसित होने की प्रक्रिया में थी तो स्वाभाविक है कि दोनों धर्मावलंबियों के आपसी संबंधों का यह वैशिष्ट्य इसके विकास पर भी असर डालता। एक तरफ तो दोनों जीवन पद्धतियों को अभिव्यक्त करने वाले शब्द इस नयी भाषा में आ रहे थे और दूसरी तरफ इसे सांप्रदायिक चोला पहनाने की भी कोशिश हो रही थी। एक तरफ तो शाह हातिब के नेतृत्त्व में चलने वाला मतरूकात आन्दोलन था जिसका आग्रह था कि खड़ी बोली से भाखा के शब्द निकाल दिए जाय और उनकी जगह अरबी फारसी का इस्तेमाल हो। इसी तरह हिंदी में ऐसे उत्साहियों की कभी कमी नहीं रही जो मानते हैं कि संस्कृत हिंदी की जननी है और हिंदी से अरबी फारसी के शब्द निकाल दिए जाय। व्रज समर्थक राधा चरण गोस्वामी का खड़ी बोली में कविता लिखने के विरुद्ध एक तर्क यह भी देते थे कि इससे उर्दू मज़बूत होगी जबकि अयोध्या प्रसाद खत्री हिंदी वालों से खड़ी बोली में कविता लिखने को कहते थे और उर्दू शायरों को नागरी लिपि अपनाने की सलाह देते थे। छायावाद तक आप पायेंगे कि हिंदी के कविताओं में ठूंस-ठूंस कर क्लिष्ट संस्कृत शब्द भरे गए हैं। यह तो 1936 के बाद परवान चढ़े मजबूत प्रगतिशील आंदोलन से ही संभव हो पाया कि जनता के बीच बोली जाने वाली भाषा साहित्य की भाषा बन गयी। नागरी प्रचारिणी सभा, साहित्य सम्मेलन प्रयाग या ज्ञानमंडल के शब्दकोशों पर संस्कृत के प्रति आग्रह स्पष्ट दिखता है। डाक्टर रघुबीर जैसे लोगों के नेतृत्व में आजादी के बाद संस्कृत बोझिल हिंदी को राजभाषा बनाने का प्रयास हुआ पर हमनें उसका हश्र देखा है। लोगो नें इस भाषा का इस्तेमाल लतीफे गढ़नें में अधिक किया। आज भारत सरकार के गृह मंत्रालय को, जो राजभाषा का प्रभारी मंत्रालय है, एक सरकुलर जारी कर कहना पड़ा है कि सरकारी कामकाज में जरूरत पड़ने पर मुश्किल हिंदी शब्दों के स्थान पर प्रचलित अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है। हम अपनी फ़िल्में, मीडिया, बोलचाल – किसी को लें, हमें सैकड़ों ऐसे अंगरेजी के शब्द मिलेंगे जो सहज स्वाभाविक रूप से हमारी भाषा में घुल मिल गए हैं और अब हिंदी के शब्द बन गए हैं। यह हिंदी की कमजोरी नहीं बल्कि उसके समावेशी चरित्र का उदाहरण है जिसने इसके पहले अरबी, फारसी, तुर्की, पुर्तगाली और न जाने कितनी अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण किया है और अपने क्रियापदों से तालमेल बैठाकर उन्हें हिंदी का शब्द बना दिया है। विश्व की सभी बड़ी भाषाएं दूसरी भाषाओँ से आदान प्रदान करतीं हैं। खुद अंगरेजी के शब्दकोश में आधे से अधिक शब्द मूल रूप से उसके नहीं हैं। जो लोग इस शब्द कोश में अंगरेजी के शब्दों को लिए जाने का विरोध कर रहें हैं वे उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में प्रचलित हिंदुत्व की धारणा के अनुरूप काम कर रहे हैं जो उस समय अरबी,फारसी के शब्दों के प्रयोग का विरोध कर हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बनाना चाहती थी। वे पहले भी सफ़ल नहीं हुए और अब भी नहीं होंगे क्योकि वे भूल रहे हैं कि भाषा जनता बनाती है भाषाविद या शब्द्कोशकर नही।
-- प्रेम भारद्वाज
( हस्तक्षेप से साभार । २८ मई २०१४ को प्रकाशित )